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न्यूजीलैंड में पीएम मोदी से जुड़ा सवाल सुनते ही मुस्कुरा दिए भारतीय अधिकारी... फिर दिया ऐसा जवाब, जिसकी हर तरफ चर्चा शुरू हो गई!

 


वेलिंगटन/नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान आयोजित एक मीडिया ब्रीफिंग में उस समय दिलचस्प स्थिति बन गई, जब एक स्थानीय पत्रकार ने भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) से सवाल पूछा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी यात्रा के दौरान कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की। इस प्रश्न के जवाब में विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ऐसे नेता हैं जो अपने मतदाताओं और आम जनता से सीधे संवाद करना पसंद करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय मतदाता, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोग, नेताओं से सीधा संपर्क पसंद करते हैं, न कि "बिचौलियों" के माध्यम से संवाद।

यह जवाब सामने आते ही चर्चा का विषय बन गया और मीडिया ब्रीफिंग का यह हिस्सा सोशल मीडिया पर भी तेजी से साझा किया जाने लगा।

क्या था पूरा मामला?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन देशों की विदेश यात्रा के अंतिम चरण में न्यूजीलैंड पहुंचे थे। इस दौरान भारत और न्यूजीलैंड के बीच कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत हुई। यात्रा के समापन पर आयोजित मीडिया ब्रीफिंग में न्यूजीलैंड के एक पत्रकार ने विदेश मंत्रालय के सचिव (ईस्ट) रुद्रेंद्र टंडन से सवाल किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने दौरे के दौरान पत्रकारों से सीधे बातचीत या प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं की।

यह प्रश्न सुनते ही रुद्रेंद्र टंडन पहले मुस्कुराए और फिर उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि यह सवाल उन्हें "डेजा वू" (Déjà vu) जैसा महसूस करा रहा है।

'डेजा वू' शब्द का किया इस्तेमाल

रुद्रेंद्र टंडन ने जवाब की शुरुआत करते हुए कहा कि उन्हें ऐसा लग रहा है जैसे यही प्रश्न पहले भी पूछा जा चुका हो।

उन्होंने बताया कि इसी वर्ष प्रधानमंत्री की नॉर्वे यात्रा के दौरान भी लगभग यही सवाल सामने आया था।

"डेजा वू" एक फ्रांसीसी शब्द है, जिसका अर्थ होता है—ऐसा अनुभव होना कि यह घटना पहले भी घट चुकी है या पहले देखी जा चुकी है।

उनकी इस टिप्पणी पर वहां मौजूद पत्रकारों के बीच हल्की मुस्कान भी देखने को मिली।

विदेश मंत्रालय ने क्या कहा?

इसके बाद रुद्रेंद्र टंडन ने विस्तार से भारत के राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय मतदाता नेताओं से सीधा संवाद पसंद करते हैं।

उन्होंने कहा कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के लोग अपने नेताओं से प्रत्यक्ष संपर्क को अधिक महत्व देते हैं।

उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्षों के दौरान सीधे जनता तक पहुंचने की एक ऐसी शैली विकसित की है, जिसे बड़ी संख्या में लोग पसंद करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री का जनता से सीधा संवाद ही उनकी राजनीतिक शैली की प्रमुख विशेषताओं में से एक है।

'बिचौलियों के जरिए बात करना पसंद नहीं'

रुद्रेंद्र टंडन ने अपने जवाब में कहा कि भारतीय मतदाता किसी तीसरे माध्यम या बिचौलियों के जरिए संवाद करने की अपेक्षा सीधे नेता से जुड़ना पसंद करते हैं।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी प्रत्यक्ष संवाद की कला में महारत हासिल की है।

उनके अनुसार, यही कारण है कि प्रधानमंत्री लगातार जनता के साथ सीधे जुड़ने के विभिन्न माध्यमों का उपयोग करते रहे हैं।

उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि प्रधानमंत्री अब अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और देश के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले प्रधानमंत्रियों में शामिल हैं।

न्यूजीलैंड यात्रा क्यों रही खास?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

बताया गया कि पिछले लगभग चार दशकों में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली द्विपक्षीय न्यूजीलैंड यात्रा है।

यह दौरा प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की बहु-देशीय यात्रा का अंतिम पड़ाव था।

इस दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, शिक्षा, तकनीक, कृषि, रक्षा सहयोग और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में साझेदारी जैसे कई विषयों पर चर्चा हुई।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस यात्रा का उद्देश्य दोनों देशों के संबंधों को नई गति देना भी था।

प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर पहले भी उठ चुके हैं सवाल

यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं के दौरान प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर प्रश्न पूछा गया हो।

इससे पहले भी अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय दौरों के दौरान विदेशी पत्रकारों ने इसी प्रकार के सवाल उठाए हैं।

हालांकि भारत सरकार की ओर से समय-समय पर यह कहा जाता रहा है कि प्रधानमंत्री विभिन्न माध्यमों से जनता और मीडिया तक अपनी बात पहुंचाते हैं।

सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री के भाषण, सार्वजनिक कार्यक्रम, डिजिटल प्लेटफॉर्म और अन्य संवाद माध्यम लोगों तक सीधे संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सीधे संवाद की शैली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से जनता के साथ प्रत्यक्ष संवाद की शैली अपनाते रहे हैं।

चुनावी सभाओं, सार्वजनिक कार्यक्रमों, डिजिटल माध्यमों और रेडियो कार्यक्रमों के जरिए वे बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचते हैं।

सरकार का कहना है कि इस मॉडल के माध्यम से बिना किसी मध्यस्थ के जनता तक संदेश पहुंचाया जाता है।

वहीं आलोचक समय-समय पर प्रेस कॉन्फ्रेंस और पत्रकारों के सीधे सवालों के महत्व पर भी अपनी राय रखते रहे हैं। यह बहस भारतीय राजनीति में कई वर्षों से चर्चा का विषय रही है।

सोशल मीडिया पर भी हुई चर्चा

मीडिया ब्रीफिंग का यह वीडियो सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं।

कुछ लोगों ने विदेश मंत्रालय के अधिकारी के जवाब की सराहना की और इसे भारत के लोकतांत्रिक मॉडल की विशेषता बताया।

वहीं कुछ लोगों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस और मीडिया से प्रत्यक्ष सवाल-जवाब की लोकतांत्रिक भूमिका पर भी अपनी राय व्यक्त की।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे प्रश्न और उनके उत्तर लोकतांत्रिक विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं।

भारत-न्यूजीलैंड संबंधों को मिली नई दिशा

विशेषज्ञों का मानना है कि यात्रा का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना था।

भारत और न्यूजीलैंड के बीच शिक्षा, कृषि, व्यापार, तकनीकी सहयोग, पर्यटन और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी लगातार बढ़ रही है।

दोनों देशों ने भविष्य में आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी दोहराई।

इसी वजह से यह यात्रा केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

न्यूजीलैंड में आयोजित मीडिया ब्रीफिंग के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर पूछे गए सवाल और विदेश मंत्रालय के सचिव (ईस्ट) रुद्रेंद्र टंडन के जवाब ने व्यापक चर्चा को जन्म दिया। अधिकारी ने प्रधानमंत्री की संवाद शैली को भारतीय मतदाताओं की अपेक्षाओं से जोड़ते हुए कहा कि वे सीधे जनता से जुड़ना पसंद करते हैं। वहीं यह घटनाक्रम एक बार फिर इस बहस को भी सामने लाया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संवाद के विभिन्न स्वरूपों की क्या भूमिका है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री की न्यूजीलैंड यात्रा ने भारत और न्यूजीलैंड के द्विपक्षीय संबंधों को नई गति देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण संदेश दिया।

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